संसद में तीन कृषि कानूनों के पारित होने से देशभर में व्यापक बहस और संघर्ष शुरू हो गया है। किसान इन कानूनों का विरोध करने के लिए देशभर में सड़कों पर आ गए हैं , खास तौर पर पंजाब और हरियाणा में। इन आंदोलनों को देखकर ऐसा लगता है जैसे इनमें एक बड़े किसान आंदोलन की विशेषता हो जो राज्य द्वारा अपने हितों को नज़रअंदाज करने की कोशिस के खिलाफ ,उन्हें बैकफुट  पर लाना चाहते हों । राजनीतिक दल , केंद्र, और साथ ही  सुप्रीम  कोर्ट  भी मैदान  में आ गए हैं।

कृषि सुधार से जुड़े राजनीतिक और कानूनी मंथन के एक जैसे उदाहरण ,पूरे भारतीय इतिहास में मिलते हैं, खासकर 20 वीं शताब्दी में।  कृषि आंदोलनों ने राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को अपने हितों पर बातचीत के लिए मजबूर किया था  और दिलचस्प रूप से, इन आंदोलनों ने अक्सर बड़ी स्वतंत्रता और संवैधानिक सुधार आंदोलनों में खुद को बदल दिया।

औपनिवेशिक भारत में कृषि सुधार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संवैधानिक और राजनीतिक एजेंडे का एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। कांग्रेस ने  1920 के दशक की शुरुआत में, ब्रिटिश बागान मालिकों के खिलाफ अपनी शिकायतों को उठाने के लिए किसानों को लामबंद किया एवं चंपारण (1917) और खेड़ा (1918) की तरह किसान आंदोलनों को नेतृत्व और समर्थन प्रदान करने की मांग की। असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद, इस तरह के आंदोलनों में कमी आई। किसानों के दबाव ने कांग्रेस को कृषि आंदोलनों को पुनर्जीवित करने और भूमि राजस्व सत्याग्रह को बड़े नागरिक अवज्ञा आंदोलन के हिस्से के रूप में लॉन्च करने के लिए मजबूर किया।

कांग्रेस अक्सर अपने संवैधानिक और राजनीतिक दस्तावेजों में किसानों की मांगों को  रखती  रही है । कराची संकल्प 1931 और कांग्रेस का 1936 का चुनावी घोषणापत्र में भू-राजस्व और किराए के मुद्दों को भी शामिल किया गया । 1930 के दशक के मध्य में अखिल भारतीय किसान सभा की तरह किसान संगठन  मजबूत हुईं और कृषि आंदोलन अधिक संगठित और संरचित हो रहे थे और कृषि सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव बनाने में सक्षम थे: नवनिर्वाचित, कांग्रेस के  प्रांतीय सरकारों ने किसान के हितों की रक्षा के लिए कानून पेश किया

भारत जैसे देश में जहां कृषि क्षेत्र में 50% से अधिक लोग कार्यरत हैं, संवैधानिक और राजनीतिक बातचीत के माध्यम से कृषि संबंधी मुद्दों और सुधारों को संबोधित करने की आवश्यकता अनिवार्य  है। भारत कोई औपनिवेशिक राज्य  नहीं है; यह अब एक स्वतंत्र संवैधानिक गणराज्य है।

क्या भारत के राजनीतिक दल,नागरिक समाज और संस्था , ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान हासिल की गई तुलना में, हमारे संवैधानिक ढांचे के भीतर कृषि क्षेत्र के हितों के साथ जुड़ने और उनकी रक्षा करने का बेहतर काम कर सकते हैं?

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(Translated by Rajesh Ranjan from Socio Legal Literary)